Deoghar Cyber Crackdown : देवघर के जंगलों से चल रहा था ठगी का काला साम्राज्य, 11 साइबर अपराधी गिरफ्तार
देवघर के पालाजोरी में पुलिस ने छापेमारी कर 11 शातिर साइबर अपराधियों को दबोचा है। फ्लिपकार्ट और अमेजॉन के नाम पर ओटीपी ठगी करने वाले इस गिरोह और डीएसपी की चेतावनी की पूरी इनसाइड रिपोर्ट यहाँ देखें।
देवघर/झारखंड, 9 अप्रैल 2026 – झारखंड का देवघर जिला, जो अपनी आध्यात्मिक पहचान के लिए विश्व प्रसिद्ध है, वहां की पुलिस ने साइबर अपराध के बढ़ते 'काले साये' पर एक और जोरदार प्रहार किया है। पालाजोरी थाना क्षेत्र में पुलिस ने एक बड़े ऑपरेशन के तहत 11 शातिर साइबर अपराधियों को रंगे हाथों गिरफ्तार किया है। ये अपराधी सुनसान झाड़ियों और खेतों में बैठकर देश भर के मासूम लोगों की मेहनत की कमाई पर डाका डाल रहे थे। साइबर डीएसपी राजा कुमार मित्रा ने इस पूरी कार्रवाई का खुलासा करते हुए बताया कि कैसे ये युवा अपनी उम्र का इस्तेमाल रचनात्मकता के बजाय क्राइम सिंडिकेट बनाने में कर रहे थे।
झाड़ियों में 'कॉल सेंटर': कैसे चलता था ठगी का खेल
पकड़े गए अपराधियों का काम करने का तरीका किसी भी कॉर्पोरेट कॉल सेंटर से कम नहीं था, फर्क सिर्फ इतना था कि ये मदद के बजाय लूट की योजना बनाते थे।
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फर्जी पहचान: आरोपी खुद को फ्लिपकार्ट (Flipkart), अमेजॉन (Amazon) या एयरटेल पेमेंट बैंक (Airtel Payment Bank) का कर्मचारी बताकर लोगों को कॉल करते थे।
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लालच और डर: ये लोगों को भारी डिस्काउंट, केवाईसी अपडेट या रिवॉर्ड पॉइंट्स का झांसा देते थे। जैसे ही सामने वाला व्यक्ति इनकी बातों में आता, ये उनके मोबाइल पर एक ओटीपी (OTP) भेजते थे।
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खाता साफ: ओटीपी मिलते ही चंद सेकंडों में पीड़ित का बैंक खाता पूरी तरह खाली कर दिया जाता था।
युवा अपराधी: 19 से 30 साल की उम्र में जुर्म का रास्ता
हैरानी की बात यह है कि इस गिरोह के सभी सदस्य काफी युवा हैं, लेकिन जुर्म की दुनिया में इनके हौसले पुराने अपराधियों जैसे हैं।
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गिरफ्तार अभियुक्त: गुलाम रब्बानी, बजरंगी मंडल, मनीष मंडल, ब्रह्मदेव दास, अरबाज अंसारी, ताजुद्दीन अंसारी, मनवर अंसारी, असलम अंसारी, विनोद मिर्धा, उपेंद्र मेहरा और विक्रम रजक।
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हिस्ट्रीशीटर: पुलिस के अनुसार, उपेंद्र मेहरा और ब्रह्मदेव दास पुराने अपराधी हैं। ये पहले भी जेल जा चुके हैं, लेकिन बाहर आते ही इन्होंने फिर से अपना ठगी का नेटवर्क खड़ा कर लिया।
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गुप्त सूचना पर रेड: पुलिस को खबर मिली थी कि पालाजोरी के एक सुनसान इलाके में संदिग्ध युवक मोबाइल और लैपटॉप के साथ जुटे हुए हैं। टीम ने तुरंत घेराबंदी की और किसी को भागने का मौका नहीं दिया।
'साइबर ठगी' का गढ़ बनने की दुखद गाथा
देवघर और इसके पड़ोसी जिले जामताड़ा का नाम पिछले एक दशक में साइबर अपराध के पर्याय के रूप में उभरा है, जो प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती है।
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भौगोलिक स्थिति का फायदा: देवघर का पालाजोरी और करों जैसे इलाके जंगलों और सुनसान पहाड़ियों से घिरे हैं। अपराधी यहाँ बैठकर मोबाइल टावर का इस्तेमाल करते हैं, जिससे उनकी लोकेशन ट्रेस करना मुश्किल होता रहा है।
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बदनाम इतिहास: 2015-16 के बाद से यहाँ 'फिशिंग' और 'स्कैमिंग' की शुरुआत हुई। शुरुआत में ये केवल मोबाइल सिम ब्लॉक होने का डर दिखाकर ठगी करते थे, लेकिन अब ये आधुनिक ऐप्स और ई-कॉमर्स साइट्स का सहारा लेकर हाईटेक हो गए हैं।
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पुलिस की कार्रवाई: अकेले देवघर जिले से पिछले कुछ महीनों में 100 से अधिक साइबर अपराधियों को जेल भेजा जा चुका है, लेकिन बेरोजगारी और रातों-रात अमीर बनने की चाहत युवाओं को फिर से इस दलदल में खींच लाती है।
अगली कार्रवाई: रडार पर हैं मुख्य सप्लायर और सिम प्रोवाइडर्स
पुलिस अब इन 11 आरोपियों के मोबाइल फोन और सिम कार्ड्स की सघन जांच कर रही है।
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फर्जी सिम का जाल: पुलिस यह पता लगा रही है कि इन अपराधियों को फर्जी नामों पर सक्रिय सिम कार्ड कौन उपलब्ध करा रहा था। अक्सर ये सिम कार्ड पश्चिम बंगाल या बिहार के दूर-दराज इलाकों से मंगाए जाते हैं।
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बैंक खातों की जांच: तस्करों ने ठगी के पैसे किन 'म्यूल अकाउंट्स' (दूसरों के बैंक खाते) में ट्रांसफर किए हैं, उनकी पहचान कर उन्हें फ्रीज करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।
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डीएसपी की सख्त अपील: डीएसपी राजा कुमार मित्रा ने आम जनता से फिर से अपील की है कि किसी भी अनजान कॉल पर अपना ओटीपी या बैंक डिटेल्स शेयर न करें। याद रखें, कोई भी बैंक या ई-कॉमर्स कंपनी फोन पर आपका ओटीपी नहीं मांगती।
देवघर पुलिस की यह कार्रवाई सराहनीय है, लेकिन 11 अपराधियों की गिरफ्तारी के बावजूद यह लड़ाई लंबी है। 19 साल के युवाओं का इस तरह तकनीकी रूप से दक्ष होकर अपराध करना समाज के लिए एक गंभीर चेतावनी है। पालाजोरी में हुई यह रेड उन साइबर ठगों के लिए एक संदेश है जो सोचते हैं कि वे जंगलों में बैठकर कानून की नजरों से बच जाएंगे। देवघर पुलिस का 'ऑपरेशन क्लीन' तब तक जारी रहेगा जब तक बाबा नगरी की पहचान पर लगा यह 'साइबर कलंक' पूरी तरह धुल नहीं जाता। फिलहाल, पुलिस इन सभी को न्यायिक हिरासत में भेजकर इनके पूरे नेटवर्क को ध्वस्त करने में जुटी है।
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