Bahragora Bomb: बहरागोड़ा में दूसरे विश्व युद्ध का अमेरिकी बम, 500 पाउंड वजनी 'जिंदा बारूद' से कांपा झारखंड, सेना ने संभाली कमान
बहरागोड़ा की सुवर्णरेखा नदी में रेत खुदाई के दौरान दूसरे विश्व युद्ध काल का 500 पाउंड वजनी अमेरिकी हवाई बम मिला है। पिछले 6 दिनों से खुले आसमान के नीचे पड़े इस महाविनाशक विस्फोटक को निष्क्रिय करने के लिए भारतीय सेना का बम निरोधक दस्ता मौके पर पहुँच चुका है। इस खौफनाक सच की पूरी रिपोर्ट यहाँ देखें।
बहरागोड़ा/पूर्वी सिंहभूम, 23 मार्च 2026 – झारखंड के बहरागोड़ा में सुवर्णरेखा नदी के तट पर एक ऐसा मंजर देखने को मिल रहा है जिसे देखकर विशेषज्ञों के भी पसीने छूट गए हैं। पनिपाड़ा-नागुडसाई मार्ग के पास नदी की रेत से द्वितीय विश्व युद्ध (World War II) के समय का एक विशालकाय और सक्रिय अमेरिकी हवाई बम बरामद हुआ है। करीब 500 पाउंड (लगभग 226 किलो) वजनी यह बम पिछले छह दिनों से खुले आसमान के नीचे लावारिस पड़ा था, जो एक बेहद खौफनाक लापरवाही की ओर इशारा करता है। सोमवार की सुबह भारतीय सेना के बम निरोधक दस्ते (BDS) ने मौके पर पहुँचकर इस 'मौत के गोले' को सुरक्षित करने का ऑपरेशन शुरू कर दिया है। पूरे इलाके को छावनी में तब्दील कर दिया गया है और ग्रामीणों की धड़कनें तेज हैं।
6 दिनों तक 'मौत' के साथ रहे ग्रामीण: प्रशासन की बड़ी चूक?
हैरानी और दहशत की बात यह है कि यह बम पिछले हफ्ते ही रेत खुदाई के दौरान मिला था।
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खुले में पड़ा बारूद: नदी किनारे छह दिनों तक इतने शक्तिशाली विस्फोटक का असुरक्षित पड़े रहना किसी बड़े हादसे को दावत देने जैसा था।
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देर से जागी नींद: सोमवार को जब स्थिति की गंभीरता प्रशासन की समझ में आई, तब सेना को सूचित किया गया। अगर इन 6 दिनों में कोई अनहोनी होती, तो बहरागोड़ा का एक बड़ा हिस्सा नक्शे से मिट सकता था।
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सेना का घेरा: सोमवार सुबह सेना की विशेष टीम ने पहुँचते ही पनिपाड़ा-नागुडसाई मार्ग को पूरी तरह सील कर दिया है। तकनीकी जांच से पता चला है कि यह बम आज भी सक्रिय (Active) अवस्था में है।
बम पर अंकित 'American Unexploded': इतिहास का खौफनाक सच
इस विशालकाय बम की बॉडी पर कुछ कोड्स और शब्द लिखे हैं जो इसके इतिहास की गवाही दे रहे हैं।
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मार्किंग का रहस्य: बम पर स्पष्ट रूप से ‘AN-M64 500 lb… American… unexploded’ अंकित है। यह द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अमेरिका द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला जनरल पर्पज बम है।
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विश्व युद्ध का कनेक्शन: विशेषज्ञों का मानना है कि 1940 के दशक में जब मित्र देशों की सेनाएं दक्षिण-पूर्व एशिया में जापानी सेना से लड़ रही थीं, तब भारत के इस हिस्से में कई हवाई ठिकाने (Airstrips) थे। संभवतः किसी तकनीकी खराबी के कारण यह बम विमान से गिरने के बाद फटा नहीं और सुवर्णरेखा की रेत में दब गया।
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दशकों बाद भी घातक: रेत के भीतर ऑक्सीजन की कमी के कारण इसका विस्फोटक मसाला (Explosive Charge) आज भी सुरक्षित और बेहद संवेदनशील है।
बहरागोड़ा में दहशत: 'बम' के पास जाने पर पाबंदी
जैसे ही यह खबर फैली कि नदी किनारे मिला लोहा कोई साधारण कबाड़ नहीं बल्कि एक 'सक्रिय बम' है, पूरे इलाके में हड़कंप मच गया।
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ग्रामीणों का खौफ: पनिपाड़ा और आसपास के गाँवों के लोग इस बात से डरे हुए हैं कि वे पिछले कई दिनों से इस महाविनाशक वस्तु के इतने करीब थे।
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सुरक्षा प्रोटोकॉल: सेना के बम निरोधक दस्ते ने बम के चारों ओर मिट्टी की बोरियों (Sandbags) का घेरा बनाना शुरू कर दिया है ताकि यदि कोई अनचाहा धमाका हो, तो उसका प्रभाव कम किया जा सके।
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डिफ्यूज की चुनौती: सेना के इंजीनियर अब इस बात का फैसला करेंगे कि इसे वहीं निष्क्रिय किया जाए या किसी सुनसान जगह पर ले जाकर विस्फोट (Controlled Explosion) किया जाए।
अगला कदम: 'डिफ्यूज' करने की जटिल प्रक्रिया
सोमवार दोपहर से सेना की टीम ने इस 'अनएक्सप्लोडिड' बम की एक्स-रे जांच और तकनीकी मैपिंग शुरू कर दी है।
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हाई-अलर्ट पर पुलिस: स्थानीय पुलिस ने 2 किमी के दायरे में किसी भी बाहरी व्यक्ति के प्रवेश पर रोक लगा दी है।
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खतरनाक ऑपरेशन: 500 पाउंड के बम को डिफ्यूज करना एक बहुत ही जोखिम भरा काम है। सेना की कोशिश है कि बिना किसी जान-माल के नुकसान के इस ऐतिहासिक 'श्राप' को बेअसर कर दिया जाए।
बहरागोड़ा में सुवर्णरेखा नदी के तट पर मिला यह अमेरिकी बम हमें याद दिलाता है कि इतिहास की कड़वी यादें कभी खत्म नहीं होतीं। 80 साल से रेत में दबी मौत का आज अचानक बाहर आना न केवल एक पुरातात्विक घटना है, बल्कि सुरक्षा व्यवस्था के लिए एक बड़ी परीक्षा भी है। सेना का दस्ता अपनी जान जोखिम में डालकर इस मिशन में जुटा है। क्या बहरागोड़ा की धरती आज सुरक्षित तरीके से इस संकट से मुक्त हो पाएगी? फिलहाल, पूरा झारखंड सेना के इस 'बम डिस्पोजल मिशन' की सफलता की दुआ कर रहा है।
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