Sakchi Salute: सुभाष मैदान में गूँजा 'जय हिंद', पूर्व सैनिकों ने नेताजी को बताया राष्ट्र का प्रथम प्रधानमंत्री, अंडमान से साकची तक की वीरगाथा से जोश में आए युवा
जमशेदपुर के साकची स्थित सुभाष मैदान में अखिल भारतीय पूर्व सैनिक सेवा परिषद द्वारा मनाई गई नेताजी की 129वीं जयंती और 'पराक्रम दिवस' की पूरी रिपोर्ट यहाँ मौजूद है। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री के रूप में नेताजी की वैश्विक मान्यता और शस्त्र-शास्त्र के अद्भुत संगम की यह प्रेरणादायक दास्तां पढ़िए वरना आप राष्ट्रभक्ति के इस गौरवशाली अध्याय को जानने से चूक जाएंगे।
जमशेदपुर/साकची, 23 जनवरी 2026 – लौहनगरी के हृदय स्थल साकची स्थित नेताजी सुभाष मैदान में आज 'जय हिंद' और 'भारत माता की जय' के नारों ने एक अलग ही ऊर्जा का संचार कर दिया। मौका था आजाद हिंद फौज के सर्वोच्च कमांडर नेताजी सुभाष चंद्र बोस की 129वीं जयंती का, जिसे अखिल भारतीय पूर्व सैनिक सेवा परिषद, जमशेदपुर ने पूरे सैन्य सम्मान के साथ 'पराक्रम दिवस' के रूप में मनाया। मैदान में उपस्थित सैकड़ों लोगों और पूर्व सैनिकों की आंखों में वही चमक थी, जो कभी आजाद हिंद फौज के सिपाहियों में हुआ करती थी। कार्यक्रम के दौरान न केवल नेताजी को पुष्पांजलि अर्पित की गई, बल्कि उनके उस ऐतिहासिक सच को भी दोहराया गया जिसे इतिहास की मुख्यधारा में अक्सर दबा दिया गया।
सुप्रीम कमांडर को 'सैनिक' सलाम: पुष्पों से महक उठा मैदान
अखिल भारतीय पूर्व सैनिक सेवा परिषद के जमशेदपुर अध्यक्ष संतोष कुमार सिंह ने नेताजी की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर कार्यक्रम की औपचारिक शुरुआत की।
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युवाओं के प्रेरणास्रोत: परिषद के सदस्य योगेश कुमार सिंह ने नेताजी के जीवन के अनछुए पहलुओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि नेताजी 'शस्त्र और शास्त्र' के सम्यक समन्वय के प्रतीक थे, जिन्होंने युवाओं को सिखाया कि बुद्धि और शक्ति का सही संतुलन ही राष्ट्र को स्वतंत्र करा सकता है।
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अंडमान का ऐतिहासिक कनेक्शन: कार्यक्रम में भारतीय नौसेना में सेवा दे चुके पूर्व सैनिकों ने अंडमान व निकोबार द्वीप समूह में नेताजी द्वारा तिरंगा फहराने की उस ऐतिहासिक घटना को याद किया, जिसने अंग्रेजों के ताबूत में आखिरी कील ठोकने का काम किया था।
इतिहास का पन्ना: क्या नेताजी ही थे भारत के 'प्रथम प्रधानमंत्री'?
पूर्व सैनिक संसार प्रसाद ने एक ऐसा तथ्य रखा जिसने वहां मौजूद हर व्यक्ति को सोचने पर मजबूर कर दिया। उन्होंने कहा कि नेताजी केवल एक क्रांतिकारी नहीं, बल्कि राष्ट्र के प्रथम प्रधानमंत्री थे।
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वैश्विक मान्यता: इतिहास गवाह है कि 21 अक्टूबर 1943 को सिंगापुर में 'आजाद हिंद सरकार' (Arzi Hukumat-e-Azad Hind) के गठन के बाद, तत्कालीन विश्व के 9 देशों (जिनमें जापान, जर्मनी और इटली शामिल थे) ने इस सरकार को आधिकारिक मान्यता दी थी।
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साहसिक निर्णय: जब देश के भीतर कई लोग कूटनीति में उलझे थे, तब नेताजी ने सात समंदर पार जाकर अपनी फौज खड़ी की। जमशेदपुर के साकची मैदान में आज इसी अदम्य साहस को याद किया गया, जिसने यह साबित किया कि नेताजी ने एक संप्रभु राष्ट्र की नींव 1947 से बहुत पहले ही रख दी थी।
पराक्रम दिवस: कार्यक्रम की मुख्य झलकियां (Event Snapshot)
| विवरण | मुख्य विवरण (Details) |
| आयोजक | अखिल भारतीय पूर्व सैनिक सेवा परिषद, जमशेदपुर |
| मुख्य अतिथि/अध्यक्ष | संतोष कुमार सिंह |
| प्रमुख वक्ता | योगेश कुमार सिंह, संसार प्रसाद |
| नारे | 'जय हिंद', 'भारत माता की जय' |
| उपस्थिति | 25 से अधिक पूर्व सैनिक एवं सैकड़ों नागरिक |
जमशेदपुर के रणबांकुरों का संकल्प
कार्यक्रम में मौजूद पूर्व सैनिकों ने नई पीढ़ी को देश सेवा के प्रति प्रतिबद्ध रहने की शपथ दिलाई। इस ऐतिहासिक अवसर पर मुकेश प्रसाद सिंह, अजय कुमार, नवीन कुमार, जसवीर सिंह, किशोर कुमार, बिरजू कुमार, धीरज सिंह, पवन कुमार, दया भूषण, राजेश पांडे, कृष्ण और सत्य प्रकाश समेत लगभग 25 पूर्व सैनिकों ने अपनी उपस्थिति से वातावरण को गौरवमयी बना दिया।
साकची के आम बगान मैदान से लेकर सुभाष मैदान तक फैले इस उत्साह ने यह संदेश दिया कि नेताजी के विचार आज भी जमशेदपुर की धमनियों में दौड़ रहे हैं। पूर्व सैनिकों ने कहा कि नेताजी ने हमें 'दिल्ली चलो' का नारा दिया था, और आज हमारा कर्तव्य है कि हम उनके दिखाए 'आत्मनिर्भर भारत' के पथ पर चलें।
साकची में गूंजता रहेगा 'जय हिंद'
अखिल भारतीय पूर्व सैनिक सेवा परिषद का यह आयोजन केवल एक जयंती नहीं, बल्कि एक राष्ट्रव्यापी चेतना का हिस्सा था। साकची के मैदान में गूंजता 'जय हिंद' इस बात का प्रमाण है कि भले ही समय बीत जाए, लेकिन अपने 'सुप्रीम कमांडर' के प्रति सैनिकों और जनता का सम्मान कभी कम नहीं होगा।
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