Jamshedpur River Pollution : जमशेदपुर की स्वर्णरेखा नदी में जहर घुला, बाबूडीह में कई क्विंटल मछलियों की मौत

जमशेदपुर की स्वर्णरेखा नदी में ऑक्सीजन की कमी से बाबूडीह लाल भट्ठा इलाके में कई क्विंटल मछलियां मरकर किनारे लग गई हैं। आदित्यपुर इंडस्ट्रियल एरिया के दूषित पानी और जेएनएसी की फाइलों में दबे प्रदूषण मुक्ति प्लान की पूरी ग्राउंड रिपोर्ट यहाँ देखें।

Apr 1, 2026 - 14:22
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Jamshedpur River Pollution : जमशेदपुर की स्वर्णरेखा नदी में जहर घुला, बाबूडीह में कई क्विंटल मछलियों की मौत
Jamshedpur River Pollution : जमशेदपुर की स्वर्णरेखा नदी में जहर घुला, बाबूडीह में कई क्विंटल मछलियों की मौत

जमशेदपुर, 1 अप्रैल 2026 – लौहनगरी जमशेदपुर की जीवनदायिनी मानी जाने वाली स्वर्णरेखा नदी आज खुद अपनी सांसे बचाने के लिए छटपटा रही है। बुधवार की सुबह शहर के बाबूडीह लाल भट्ठा इलाके में नदी का नजारा देख बस्ती के लोग दहल उठे। नदी के किनारे एक या दो नहीं, बल्कि कई क्विंटल मरी हुई मछलियों का अंबार लगा हुआ था। पानी में घुलते जहर और ऑक्सीजन की भारी कमी के कारण जलीय जीवन पूरी तरह तबाह हो गया है। मरी हुई मछलियों से उठ रही असहनीय बदबू ने आसपास के रिहायशी इलाकों में रहना मुहाल कर दिया है। यह घटना केवल एक पर्यावरणीय आपदा नहीं है, बल्कि नगर प्रशासन और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की विफलता का जीता-जागता सबूत है।

बाबूडीह में बिछीं 'मौत की चादर': कई क्विंटल मछलियां खत्म

स्थानीय निवासियों के अनुसार, नदी के पानी का रंग पिछले कुछ दिनों से काला पड़ने लगा था, लेकिन बुधवार की सुबह स्थिति भयावह हो गई।

  • मछलियों का अंबार: नदी किनारे छोटी से लेकर बड़ी मछलियां मरी हुई पाई गईं। अनुमान लगाया जा रहा है कि जहरीले कचरे के अचानक बहाव के कारण ऑक्सीजन का स्तर शून्य हो गया, जिससे मछलियों का दम घुट गया।

  • बदबू से जीना दुश्वार: तट पर जमा मछलियों के सड़ने से उठ रही दुर्गंध के कारण बाबूडीह और लाल भट्ठा इलाके के लोगों का सांस लेना मुश्किल हो गया है। संक्रामक बीमारियों के फैलने का डर भी सता रहा है।

  • विषाक्त जल: जानकारों का मानना है कि पानी इतना जहरीला हो चुका है कि इसमें उतरना भी त्वचा रोगों को निमंत्रण देना है।

इंडस्ट्रियल कचरा और नालों की गंदगी: कौन है जिम्मेदार?

स्वर्णरेखा नदी में प्रदूषण का स्तर बढ़ने के पीछे कोई प्राकृतिक कारण नहीं, बल्कि इंसानी लापरवाही और औद्योगिक लालच है।

  1. आदित्यपुर का जहर: आदित्यपुर इंडस्ट्रियल एरिया की दर्जनों कंपनियों का रासायनिक और दूषित पानी बिना किसी ट्रीटमेंट के सीधे नदी में गिराया जा रहा है।

  2. जमशेदपुर की कंपनियां: शहर की कई बड़ी कंपनियों का वेस्ट वाटर भी सीधे स्वर्णरेखा में मिल रहा है, जिससे पानी का बीओडी (Biological Oxygen Demand) स्तर बिगड़ गया है।

  3. शहरी गंदगी: शहर के बड़े नालों का गंदा पानी भी बिना फिल्टर किए नदी में बहाया जा रहा है, जिससे नदी एक गंदे नाले में तब्दील होती जा रही है।

फाइलों में दफन जेएनएसी (JNAC) का 2010 का प्लान

स्वर्णरेखा को बचाने के नाम पर पिछले 16 सालों में केवल कागजी घोड़े दौड़ाए गए हैं।

  • 2010 का मास्टर प्लान: जमशेदपुर अक्षेस (JNAC) ने साल 2010 में स्वर्णरेखा नदी को प्रदूषण मुक्त करने के लिए एक महत्वाकांक्षी योजना बनाई थी। इसमें नदी के तट पर सघन पौधरोपण और सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) बनाने की बात कही गई थी।

  • हाईकोर्ट के आदेश की अवहेलना: झारखंड हाईकोर्ट ने कई बार नदी के प्रदूषण पर सख्त टिप्पणी करते हुए आदेश जारी किए, लेकिन धरातल पर कुछ नहीं बदला। एसटीपी बनाने का प्रोजेक्ट आज भी फाइलों की धूल फाँक रहा है।

  • अधिकारियों की चुप्पी: जेएनएसी के अधिकारियों के पास प्रदूषण जैसे गंभीर मुद्दे पर कार्रवाई करने की फुर्सत नहीं है। हर बार मछलियों के मरने पर जांच का भरोसा दिया जाता है, लेकिन नतीजा सिफर रहता है।

पर्यावरण विशेषज्ञों की चेतावनी: 'डेड जोन' बन रही है नदी

पर्यावरणविदों के अनुसार, अगर जल्द ही कड़े कदम नहीं उठाए गए, तो स्वर्णरेखा नदी पूरी तरह से 'डेड जोन' में तब्दील हो जाएगी।

  • ऑक्सीजन का संकट: नदी में कचरा बढ़ने से काई और अन्य बैक्टीरिया पनपते हैं जो पानी की ऑक्सीजन सोख लेते हैं। बिना ऑक्सीजन के जलीय जीव मर जाते हैं, जिससे पानी और अधिक सड़ने लगता है।

  • इंसानी सेहत पर खतरा: स्वर्णरेखा का पानी कई इलाकों में सप्लाई होता है और मवेशी भी इसे पीते हैं। मछलियों की यह मौत इस बात का संकेत है कि पानी इंसानी उपभोग के लायक भी नहीं बचा है।

  • अगला कदम: स्थानीय लोगों ने मांग की है कि नदी किनारे जमा मरी हुई मछलियों को तुरंत साफ किया जाए और प्रदूषण फैलाने वाली कंपनियों पर भारी जुर्माना लगाया जाए।

जमशेदपुर की स्वर्णरेखा नदी में मछलियों का मरना केवल एक घटना नहीं, बल्कि शहर के लिए एक अलार्म है। जेएनएसी और प्रदूषण बोर्ड की चुप्पी ने इस प्राकृतिक धरोहर को विनाश की कगार पर खड़ा कर दिया है। 2010 से आज 2026 तक, योजनाएं केवल विज्ञापनों तक सीमित रहीं। बाबूडीह के लोगों का गुस्सा अब सड़कों पर उतरने को तैयार है क्योंकि उनकी 'लाइफलाइन' अब 'डेथलाइन' बनती जा रही है। क्या प्रशासन इस आपदा के बाद जागेगा या फिर अगले साल भी हम स्वर्णरेखा के किनारे मछलियों की लाशें ही गिनेंगे? यह सवाल हर जमशेदपुरवासी पूछ रहा है।

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Manish Tamsoy मनीष तामसोय कॉमर्स में मास्टर डिग्री कर रहे हैं और खेलों के प्रति गहरी रुचि रखते हैं। क्रिकेट, फुटबॉल और शतरंज जैसे खेलों में उनकी गहरी समझ और विश्लेषणात्मक क्षमता उन्हें एक कुशल खेल विश्लेषक बनाती है। इसके अलावा, मनीष वीडियो एडिटिंग में भी एक्सपर्ट हैं। उनका क्रिएटिव अप्रोच और टेक्निकल नॉलेज उन्हें खेल विश्लेषण से जुड़े वीडियो कंटेंट को आकर्षक और प्रभावी बनाने में मदद करता है। खेलों की दुनिया में हो रहे नए बदलावों और रोमांचक मुकाबलों पर उनकी गहरी पकड़ उन्हें एक बेहतरीन कंटेंट क्रिएटर और पत्रकार के रूप में स्थापित करती है।