Giridih Fraud: गिरिडीह में साइबर थाने के सिपाही ने ही कर ली 40 लाख की ठगी, नीलामी में सस्ती गाड़ियों का दिया लालच
जामताड़ा के बाद अब गिरिडीह में खाकी पर ठगी का दाग लगा है। साइबर थाने के आरक्षी गौतम शर्मा द्वारा 39 लाख की ठगी और बेंगाबाद थाने में दर्ज प्राथमिकी की पूरी इनसाइड रिपोर्ट यहाँ देखें।
गिरिडीह/बेंगाबाद, 11 अप्रैल 2026 – झारखंड में साइबर अपराध के लिए जामताड़ा का नाम पूरी दुनिया में कुख्यात है, लेकिन इस बार गिरिडीह से जो मामला सामने आया है उसने पुलिस महकमे को शर्मसार कर दिया है। रक्षक ही भक्षक बन बैठा है। गिरिडीह साइबर थाने में तैनात एक आरक्षी (Constable) गौतम कुमार शर्मा ने अपने ही जान-पहचान वालों को चूना लगाते हुए करीब 39 लाख 60 हजार रुपये की ठगी कर ली। आरोपी सिपाही ने बेंगाबाद थाने में जब्त वाहनों को सस्ते दाम पर नीलामी में दिलाने का झांसा दिया और 8 लोगों की गाढ़ी कमाई लेकर रफूचक्कर होने की कोशिश की। अब भुक्तभोगियों के आवेदन पर बेंगाबाद थाने में मामला दर्ज कर लिया गया है।
नीलामी का जाल: सिपाही ने ऐसे बुना ठगी का ताना-बना
आरोपी आरक्षी गौतम कुमार शर्मा देवघर जिले के मधुपुर (गडिया गांव) का रहने वाला है। उसकी जान-पहचान मुंडहरी निवासी महाराज प्रसाद यादव से पुरानी थी, जिसका फायदा उसने बखूबी उठाया।
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झूठा दिलासा: मई 2025 में गौतम ने महाराज यादव को फोन कर बताया कि बेंगाबाद थाने में जब्त की गई कई चार पहिया गाड़ियों की सितंबर में नीलामी होने वाली है। उसने कहा कि वह पुलिस विभाग में है, इसलिए अपने लोगों को सस्ते में गाड़ियां दिला सकता है।
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दिखाईं जब्त गाड़ियां: सिपाही के झांसे में आकर लोग बेंगाबाद थाना पहुंचे। वहां यार्ड में खड़ी गाड़ियां उन्हें पसंद आ गईं। वर्दी पर भरोसा करते हुए लोगों ने अपनी जमीन और जमापूंजी बेचकर पैसे जमा करने शुरू कर दिए।
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नकदी और ऑनलाइन ट्रांजैक्शन: महाराज यादव, उनके पुत्र अरुण कुमार समेत कुल 8 लोगों ने अलग-अलग किस्तों में 39,60,500 रुपये सिपाही को थमा दिए।
थाने पहुँचे पीड़ित तो उड़े होश: न्यायालय का कोई आदेश ही नहीं था
महीनों बीत जाने के बाद भी जब नीलामी की तारीख नहीं आई और सिपाही बहाने बनाने लगा, तब पीड़ितों को शक हुआ।
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सच्चाई का खुलासा: भुक्तभोगी जब जानकारी लेने सीधे बेंगाबाद थाने पहुंचे, तो वहां के अधिकारियों ने बताया कि जब्त वाहनों की नीलामी का न्यायालय से कोई आदेश ही नहीं आया है।
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ठगे जाने का अहसास: पीड़ितों के पैरों तले जमीन खिसक गई जब उन्हें पता चला कि सिपाही ने विभाग के नाम का इस्तेमाल कर निजी तौर पर उनसे पैसे वसूले हैं।
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तकादा और धमकी: जब पीड़ितों ने आरक्षी गौतम शर्मा से पैसे वापस मांगे, तो वह टालमटोल करने लगा। थक-हारकर महाराज प्रसाद यादव ने बेंगाबाद थाना में एफआईआर दर्ज कराई।
जामताड़ा से गिरिडीह तक: साइबर क्राइम के गढ़ में 'खाकी' की सेंधमारी
झारखंड का यह क्षेत्र ऐतिहासिक रूप से साइबर अपराध का 'एपिसेंटर' रहा है, लेकिन अब अपराधी वर्दी के भीतर से भी वार कर रहे हैं।
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बदलता मोडस ऑपरेंडी: पहले अपराधी बैंक अधिकारी या कस्टमर केयर बनकर फोन करते थे। अब पुलिस विभाग का ही एक कर्मचारी 'इंटरनल सोर्स' बनकर ठगी कर रहा है।
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भरोसे का कत्ल: गिरिडीह साइबर थाने में तैनात होना अपने आप में एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है, क्योंकि इसी थाने का काम साइबर अपराधियों को पकड़ना है। लेकिन जब वहीं का सिपाही ठग बन जाए, तो जनता का भरोसा टूटना स्वाभाविक है।
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नीलामी का सिंडिकेट: झारखंड के थानों में हजारों जब्त गाड़ियां सड़ रही हैं। इनकी नीलामी की प्रक्रिया जटिल होती है। अपराधी इसी जटिलता का फायदा उठाकर भोले-भाले लोगों को 'शॉर्टकट' का लालच देते हैं।
अगली कार्रवाई: विभागीय जांच और गिरफ्तारी की तलवार
बेंगाबाद थाना पुलिस ने मामला दर्ज कर साक्ष्य जुटाने शुरू कर दिए हैं। आरोपी आरक्षी की मुश्किलें अब बढ़ने वाली हैं।
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बैंक खातों की जांच: पुलिस उन खातों को फ्रीज करने की तैयारी में है जिनमें ऑनलाइन पैसे ट्रांसफर किए गए थे। साथ ही यह भी देखा जा रहा है कि क्या इस पैसे का इस्तेमाल कहीं निवेश या संपत्ति खरीदने में तो नहीं किया गया।
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विभागीय कार्रवाई: गिरिडीह एसपी को इस मामले की रिपोर्ट भेजी जा रही है। माना जा रहा है कि आरोपी सिपाही को तत्काल प्रभाव से निलंबित (Suspend) कर दिया जाएगा और विभागीय कार्यवाही शुरू होगी।
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पीड़ितों की सूची: पुलिस उन अन्य लोगों का भी पता लगा रही है जिन्हें गौतम शर्मा ने अपना शिकार बनाया होगा, क्योंकि ठगी की रकम काफी बड़ी है।
गिरिडीह साइबर थाने के सिपाही गौतम शर्मा ने जो किया, वह केवल एक ठगी नहीं बल्कि पुलिस की साख पर लगा एक गहरा जख्म है। 40 लाख की यह चपत उन किसानों और छोटे व्यापारियों को लगी है जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी की कमाई एक 'सस्ते सौदे' के चक्कर में खो दी। बेंगाबाद पुलिस के लिए यह साख का सवाल है कि वे अपने ही विभाग के इस 'काले भेड़' को कब तक सलाखों के पीछे पहुँचाते हैं। फिलहाल, महाराज यादव और उनके साथियों की उम्मीदें अब केवल कानून पर टिकी हैं।
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