Chandil Elephant: सापारुम गांव में जंगली हाथी का खूनी तांडव, बुजुर्ग राधा तंतुबाई की दर्दनाक मौत
चांडिल के कुकडू प्रखंड में जंगली हाथी के हमले से बुजुर्ग राधा तंतुबाई की मौत हो गई है। सापारुम गांव में हाथियों के बढ़ते आतंक और वन विभाग की लाचारी की पूरी इनसाइड रिपोर्ट यहाँ देखें।
चांडिल/सरायकेला, 11 अप्रैल 2026 – सरायकेला-खरसावां जिले के चांडिल अनुमंडल अंतर्गत कुकडू प्रखंड में एक बार फिर हाथियों का खूनी तांडव देखने को मिला है। तिरुलडीह पंचायत के सापारुम गांव में शनिवार की सुबह एक विशालकाय जंगली हाथी ने हमला कर राधा तंतुबाई (60) नामक बुजुर्ग को मौत के घाट उतार दिया। इस हृदयविदारक घटना के बाद पूरे चांडिल क्षेत्र में मातम पसरा है और ग्रामीणों के बीच भारी आक्रोश व्याप्त है। जंगली हाथियों का झुंड अब केवल खेतों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सीधे इंसानी बस्तियों में घुसकर जान ले रहा है, जिससे प्रशासन और वन विभाग की सुरक्षा तैयारियों पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
खौफनाक सुबह: संभलने का मौका तक नहीं मिला
सापारुम गांव के निवासियों के लिए शनिवार की शुरुआत किसी डरावने सपने जैसी रही।
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अचानक गांव में एंट्री: सुबह का वक्त था जब ग्रामीण अपने दैनिक कार्यों में जुटे थे, तभी एक विशालकाय गजराज जंगल से भटककर सीधे गांव की गलियों में दाखिल हो गया।
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राधा तंतुबाई पर हमला: गांव के बुजुर्ग राधा तंतुबाई हाथी के बिल्कुल करीब आ गए। इससे पहले कि वह भाग पाते या ग्रामीण शोर मचाकर उन्हें सतर्क करते, हाथी ने उन्हें अपनी चपेट में ले लिया और बेरहमी से कुचल दिया। उनकी मौके पर ही मौत हो गई।
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दहशत का मंजर: चश्मदीदों के अनुसार, हमला इतना अचानक और भयावह था कि आसपास खड़े लोग चाहकर भी राधा तंतुबाई की मदद नहीं कर सके और अपनी जान बचाने के लिए घरों में दुबक गए।
आक्रोशित ग्रामीण: वन विभाग की चुप्पी पर उठे सवाल
हाथी के हमले की खबर फैलते ही सापारुम और तिरुलडीह के ग्रामीण सड़कों पर उतर आए हैं।
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बढ़ता आतंक: ग्रामीणों का आरोप है कि पिछले कुछ महीनों से चांडिल और कुकडू के इलाकों में हाथियों की आवाजाही अनियंत्रित हो गई है।
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फसलों की बर्बादी: हाथियों का झुंड रात के समय खेतों में खड़ी धान और सब्जी की फसलों को रौंद देता है, जिससे किसानों की कमर टूट चुकी है।
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मुआवजे की मांग: मृतक के परिजनों ने प्रशासन से तत्काल उचित मुआवजा देने और क्षेत्र में हाथियों को खदेड़ने के लिए स्थायी 'क्विक रिस्पांस टीम' (QRT) की तैनाती की मांग की है।
चांडिल का इलाका भौगोलिक रूप से दलमा वन्यजीव अभयारण्य (Dalma Wildlife Sanctuary) के बफर जोन से सटा हुआ है।
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प्राचीन गलियारा: ऐतिहासिक रूप से यह क्षेत्र हाथियों का पारंपरिक गलियारा (Elephant Corridor) रहा है। झारखंड से पश्चिम बंगाल और ओडिशा के बीच हाथियों की आवाजाही के लिए चांडिल के जंगल सबसे अहम रास्ता हैं।
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बदलता व्यवहार: जानकारों का मानना है कि जंगलों के भीतर भोजन और पानी की कमी के कारण अब हाथी बस्तियों की ओर रुख कर रहे हैं। पिछले एक दशक में चांडिल और कुकडू में हाथियों के हमले में कई जानें जा चुकी हैं।
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सापारुम गांव का अतीत: सापारुम जैसे गांव पहाड़ियों के नीचे बसे हैं, जहाँ हाथियों का आना नया नहीं है, लेकिन हाल के वर्षों में हाथियों के व्यवहार में बढ़ी आक्रामकता ने इस संघर्ष को और भी खूनी बना दिया है।
प्रशासनिक टीम मौके पर और मुआवजे का आश्वासन
घटना की सूचना मिलते ही वन विभाग और स्थानीय पुलिस की टीम सापारुम गांव पहुँची है।
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शव का पोस्टमार्टम: पुलिस ने शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है। वन विभाग के अधिकारियों ने मौके पर ही कागजी कार्रवाई शुरू कर दी है ताकि मृतक के आश्रितों को सरकारी मुआवजा दिलाया जा सके।
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खदेड़ने की मुहिम: वन विभाग ने हाथियों को मशाल और ढोल-नगाड़ों के जरिए सुरक्षित जंगल की ओर खदेड़ने के लिए हाथियों की निगरानी करने वाली 'एलीफेंट ड्राइव टीम' को सक्रिय कर दिया है।
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सुरक्षा उपाय: ग्रामीणों को शाम के बाद घर से बाहर न निकलने और हाथियों के पास जाकर सेल्फी या छेड़खानी न करने की कड़ी हिदायत दी गई है।
सापारुम गांव में राधा तंतुबाई की मौत केवल एक व्यक्ति की जान जाना नहीं है, बल्कि यह इंसानी बस्तियों और जंगली जानवरों के बीच बढ़ते असंतुलन की एक और दर्दनाक कड़ी है। चांडिल का कुकडू प्रखंड आज खौफ के साये में जीने को मजबूर है। जब तक वन विभाग हाथियों के प्रबंधन के लिए कोई ठोस और स्थायी नीति नहीं बनाता, तब तक ग्रामीणों और गजराजों के बीच यह खूनी संघर्ष इसी तरह जारी रहेगा। फिलहाल, सापारुम गांव के लोग दहशत में हैं और अपनी सुरक्षा के लिए भगवान भरोसे बैठे हैं।
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