Raiyat Meet: टाटा विस्थापितों की मालगुजारी पर फंसा पेंच, उपायुक्त ने दिए जांच के कड़े आदेश, जल्द कटेगी रसीद
जमशेदपुर में टाटा लीज क्षेत्र से बाहर की जमीनों की मालगुजारी नहीं कटने से परेशान विस्थापित रैयतों ने उपायुक्त से मुलाकात की है। खतियान ऑनलाइन होने के बावजूद रसीद नहीं कटने के इस गंभीर मामले में प्रशासन ने जांच के निर्देश जारी कर दिए हैं। रैयतों की इस जीत और भविष्य की योजना की पूरी रिपोर्ट यहाँ देखें।
जमशेदपुर/पूर्वी सिंहभूम, 20 मार्च 2026 – लौहनगरी के टाटा विस्थापितों के हक की लड़ाई में आज एक बड़ा मोड़ आया है। अपनी ही जमीन की मालगुजारी (रसीद) नहीं कटने की समस्या से वर्षों से जूझ रहे रैयतों ने शुक्रवार को उपायुक्त (DC), पूर्वी सिंहभूम के दरबार में अपनी गुहार लगाई। रैयतों का दावा है कि उनकी जमीनें टाटा लीज क्षेत्र से पूरी तरह बाहर हैं और झारखंड सरकार के ऑनलाइन पोर्टल पर खतियानी रिकॉर्ड भी दर्ज है, फिर भी अंचल कार्यालय रसीद काटने में आनाकानी कर रहा है। मामले की गंभीरता को देखते हुए उपायुक्त ने संबंधित अधिकारियों को तत्काल जांच के निर्देश दिए हैं, जिससे हजारों परिवारों में न्याय की उम्मीद जगी है।
खतियान ऑनलाइन पर रसीद क्यों नहीं? उपायुक्त ने जताई हैरानी
आज समाहरणालय में हुई इस मुलाकात के दौरान रैयतों ने अपनी पीड़ा विस्तार से रखी।
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वैध कब्जा और पोर्टल रिकॉर्ड: रैयतों ने स्पष्ट किया कि जिन जमीनों की रसीद नहीं काटी जा रही है, वे टाटा लीज बाउंड्री से बाहर हैं। इन जमीनों का खतियान झारखंड सरकार के ऑनलाइन भूमि अभिलेख पोर्टल (झारभूमि) पर बाकायदा दर्ज है।
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अधिकारियों की मनमानी: रैयतों का आरोप है कि अंचल कार्यालय (CO Office) जानबूझकर मालगुजारी काटने की प्रक्रिया को लटका रहा है।
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प्रशासनिक रुख: उपायुक्त ने इस बात पर कड़ा रुख अख्तियार किया कि जब रिकॉर्ड ऑनलाइन मौजूद है, तो रसीद क्यों नहीं कट रही है। उन्होंने आश्वस्त किया कि विस्थापितों को उनके हक से वंचित नहीं रखा जाएगा और इस पूरे प्रकरण की विस्तृत जांच होगी।
रसीद न कटने से बढ़ रहे हैं संकट: कानूनी और आर्थिक बाधाएं
रैयतों ने बताया कि मालगुजारी की रसीद न होने के कारण उन्हें कई मोर्चों पर नुकसान उठाना पड़ रहा है।
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भूमि विवाद का डर: रसीद नहीं होने से भविष्य में जमीन पर कब्जे और मालिकाना हक को लेकर विवाद की आशंका बनी रहती है।
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सरकारी योजनाओं से दूरी: किसान क्रेडिट कार्ड (KCC), सरकारी सब्सिडी और अन्य कल्याणकारी योजनाओं का लाभ उठाने के लिए जमीन की रसीद अनिवार्य होती है।
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बैंकिंग प्रक्रिया में बाधा: होम लोन या कृषि ऋण लेने के लिए बैंकों को वैध राजस्व रसीद दिखानी पड़ती है, जिसके अभाव में रैयतों के फाइल रिजेक्ट हो रहे हैं।
विस्थापितों की एकजुटता: मौके पर मौजूद रहे ये दिग्गज
टाटा विस्थापितों के इस प्रतिनिधिमंडल में बड़ी संख्या में रैयत शामिल थे। इस मौके पर मुख्य रूप से हरमोहन महतो, दीपक रंजीत, तपन पांडा, मधुसूदन माझी, समतुला सिंह भूमिज और राम सिंह भूमिज उपस्थित थे। इनके अलावा युधिष्ठिर सिंह, आशीष कुमार गौड़, प्रहलाद गोप, अनीता रजक, कंचन रजक, जदोब सिंह भूमिज, तपन महतो और मनोज कुमार बंदरा ने भी अपनी बात रखी। सभी ने एक सुर में कहा कि यदि प्रशासन ने जल्द समाधान नहीं निकाला, तो वे अपनी जमीन और अधिकार की रक्षा के लिए आंदोलन को और तेज करेंगे।
अब आगे क्या? जांच के बाद होगा समाधान
उपायुक्त के आश्वासन के बाद अब गेंद अंचल कार्यालय के पाले में है।
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विशेष जांच टीम: उम्मीद जताई जा रही है कि अगले कुछ दिनों में राजस्व विभाग की एक विशेष टीम उन चिन्हित जमीनों का भौतिक सत्यापन करेगी जो लीज क्षेत्र से बाहर हैं।
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डिजिटल अपडेट: जिन रैयतों के खतियान में तकनीकी त्रुटियां हैं, उन्हें भी सुधारने का निर्देश दिया गया है ताकि ऑनलाइन रसीद काटने में कोई बाधा न आए।
जमशेदपुर जैसे औद्योगिक शहर में विस्थापित रैयतों और जमीन के अधिकारों का मुद्दा हमेशा से संवेदनशील रहा है। आज की मुलाकात ने यह साबित कर दिया है कि अगर रिकॉर्ड सही है, तो प्रशासन मदद के लिए तैयार है। खतियान ऑनलाइन होने के बावजूद रसीद न कटना एक बड़ी प्रशासनिक चूक है, जिसे सुधारने का वक्त आ गया है। क्या अब अंचल अधिकारी उपायुक्त के निर्देशों का पालन करेंगे या विस्थापितों को एक बार फिर दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ेंगे?
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