Ghatsila Upchunaav : घाटशिला उपचुनाव में सबर बस्ती का धमाका: 'बिना आधार के वोट नहीं!' - क्या आपका वोट भी फंस जाएगा?

झारखंड के घाटशिला उपचुनाव से पहले सबर जनजाति ने आधार कार्ड न बनने पर मतदान बहिष्कार का ऐलान किया। कोरोना काल में जन्मे बच्चों के बिना दस्तावेज, राशन-पेंशन से वंचित। क्या सरकार सुनेगी इनकी पुकार? जानें पूरी कहानी।

Nov 3, 2025 - 14:33
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Ghatsila Upchunaav : घाटशिला उपचुनाव में सबर बस्ती का धमाका: 'बिना आधार के वोट नहीं!' - क्या आपका वोट भी फंस जाएगा?
Ghatsila Upchunaav : घाटशिला उपचुनाव में सबर बस्ती का धमाका: 'बिना आधार के वोट नहीं!' - क्या आपका वोट भी फंस जाएगा?

जमशेदपुर, 3 नवंबर 2025 (न्यूज एडिटर डेस्क): झारखंड के पूर्वी सिंहभूम जिले में घाटशिला विधानसभा उपचुनाव की सरगर्मियों के बीच एक ऐसा विवाद खड़ा हो गया है, जो न सिर्फ चुनावी समीकरणों को हिला सकता है, बल्कि पूरे राज्य की आदिवासी राजनीति पर सवाल खड़े कर देगा। गालूडीह प्रखंड के बड़ाखुर्शी पंचायत अंतर्गत दारिसाई गांव की सबर बस्ती में रहने वाले आदिम जनजाति सबर समुदाय ने आधार कार्ड न बन पाने की वजह से आगामी 11 नवंबर को होने वाले घाटशिला उपचुनाव में मतदान बहिष्कार का ऐलान कर दिया है। इनका कहना है, "आधार नहीं तो वोट नहीं!" – एक नारा जो सरकार की लापरवाही को आईना दिखा रहा है।

सबर बस्ती के निवासी, जो मुख्य रूप से जंगलों और पहाड़ियों के बीच सादगी भरा जीवन जीते हैं, आज सरकारी योजनाओं से पूरी तरह कटे हुए महसूस कर रहे हैं। बस्ती के चेदे सबर (25 वर्ष), लालटू सबर (24), छबी सबर (20), दुखनी सबर (21), मंजरी सबर (26), मानिक सबर (7), प्रकाश सबर (5), अष्टमी सबर (3), चांदमनी सबर (8), निरंजन सबर (4), सुइटी सबर (3), गुलाबी सबर (4) और प्रेम सबर (6) – ये 13 लोग बिना आधार कार्ड के जी रहे हैं। इनमें से ज्यादातर बच्चे कोरोना महामारी के दौरान घर पर ही जन्मे थे, जिसकी वजह से उनके जन्म के कोई आधिकारिक दस्तावेज नहीं हैं। माता-पिता पंचायत भवनों के चक्कर काट-काटकर थक चुके हैं, लेकिन जन्म प्रमाण पत्र बनवाने में नौकरशाही की दीवारें रुकावट बन रही हैं।

"जन्म प्रमाण पत्र नहीं, तो आधार कैसे बनेगा?" – बस्ती के एक बुजुर्ग सबर ने गुस्से में कहा। बिना आधार के न तो राशन कार्ड पर सब्सिडी वाला अनाज मिल रहा है, न पेंशन का एक रुपया। अन्य सरकारी योजनाएं – जैसे उज्ज्वला गैस, आयुष्मान कार्ड या मनरेगा मजदूरी – सब सपनों जैसी लग रही हैं। बस्ती के पांच लोगों के पास वोटर आईडी तो है, लेकिन आधार की कमी उन्हें हर कदम पर लाचार बना रही है। आधार सेंटर पर जाकर वे जन्म प्रमाण पत्र मांगते हैं, लेकिन वो तो दूर की कौड़ी है।

यह मुद्दा सिर्फ वयस्कों तक सीमित नहीं। उत्क्रमित प्राथमिक विद्यालय घुटिया में पढ़ने वाले 10 सबर छात्रों के पास भी आधार कार्ड नहीं है, जिसकी वजह से वे स्कॉलरशिप योजनाओं से पूरी तरह वंचित हैं। "हमारे बच्चे स्कूल जाते हैं, लेकिन पढ़ाई के बाद भी भूखे सोते हैं। सरकार ने वादा किया था आदिवासियों का उत्थान, लेकिन ये क्या हो रहा है?" – एक प्रभावित मां ने आंसू पोछते हुए बताया।

घाटशिला उपचुनाव, जो पूर्व मंत्री रामदास सोरेन के निधन के बाद खाली हुई सीट पर हो रहा है, आदिवासी वोट बैंक पर केंद्रित है। भाजपा ने बाबूलाल सोरेन पर भरोसा जताया है, जबकि झामुमो और अन्य दल भी आदिवासी मुद्दों को भुनाने की कोशिश में हैं। लेकिन सबर बस्ती का यह फैसला चुनावी दलों के लिए चुनौती बन सकता है। बस्ती वालों का साफ कहना है – अगर उपचुनाव से पहले आधार कार्ड नहीं बने, तो वे किसी को भी वोट नहीं देंगे। यह बहिष्कार न सिर्फ स्थानीय स्तर पर वोट प्रतिशत को प्रभावित करेगा, बल्कि पूरे झारखंड में आदिवासी असंतोष की लहर पैदा कर सकता है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह घटना हेमंत सोरेन सरकार पर दबाव बढ़ाएगी, खासकर जब बिहार चुनावों की छाया में झारखंड की राजनीति गर्म हो रही है। क्या सरकार तुरंत जन्म प्रमाण पत्र और आधार बनाने की प्रक्रिया तेज करेगी? या यह विवाद उपचुनाव को और उलझा देगा? फिलहाल, सबर बस्ती की चुप्पी चुनावी शोर को चीरती हुई सुनाई दे रही है – एक चेतावनी, जो शायद सुनी जाए।

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Team India मैंने कई कविताएँ और लघु कथाएँ लिखी हैं। मैं पेशे से कंप्यूटर साइंस इंजीनियर हूं और अब संपादक की भूमिका सफलतापूर्वक निभा रहा हूं।